शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

शिक्षा में शिक्षक




भारतीय शिक्षण व्यवस्था में गुरु का स्थान सदैव से ही अहम रहा है | प्राचीन काल की गुरु शिष्य परंपरा तो पूरे विश्व में जानी जाती थी | लेकिन समय के साथ साथ भारतीय गुरु एक सहायक के रूप में सामने  आया | उसकी भूमिका  बच्चे के अंदर ज्ञान भरने की नही बल्कि उसके अंदर छिपे ज्ञान और कौशल को मुखरित करने की थी
एक समय था जब गुरु ही ब्रह्मा और गुरु ही सर्वेसर्वा था | पहले एक बच्चा गुरु की ही शरण में कई वर्ष रहता और जीवन की शिक्षा ग्रहण करता | लेकिन अब वातावरण कुछ और ही है  पूरे देश में शिक्षा को लेकर एक अलग ही माहौल है | विभिन्न राज्यों में प्राथमिक शिक्षा की अवस्था अत्यंत सोचनीय है

जो शिक्षक समाज का एक प्रभावी व्यक्ति था वहीँ अब वो एक सरकारी नौकर ही बन कर रह गया है | उसके लिए इस पद कोई महत्ता बची नही है | उसे तो लगाव है बच्चों से, पद से | दोष ढूंढे तो वो खुद भी इस बदलाव का पीड़ित है | ट्रेनिंग के माध्यम से सरकार अपनी जिम्मेदारी को नाम के तौर पर पूरा तो कर रही है लेकिन शिक्षक  और बच्चे उससे कितना लाभ उठा पाते हैं यह तो वर्तमान स्थितियां देखते ही बनता है | ट्रेनिंग के नाम पर केवल उपस्थिति दर्ज हो रही है यह सच है कि शिक्षक को ऐसा माहौल दिया जा रहा है जहाँ वह अपने पद से ऊब चुका  है | और सभी परिस्थितियां इतनी उदासीन है कि वह कुछ बोलना भी नही चाहता | उसका मानदेय ही उसकी जरुरत बन गया है | और यदि मानदेय या भत्ते को लेका कुछ कमियां हो तो पूरे देश में शिक्षक आन्दोलन खड़े हो जाते है | पिछले दस वर्षों से शिक्षकों ने अपने कौशल कला और गुणवत्तापूर्वक शिक्षण कैसे होना चाहिए , इसके लिए आवाज़ बुलंद नही की | केवल भत्ते को लेकर ही समाचारों में शिक्षक आन्दोलन की खबरें सुनने को मिलती हैं

पिछले दस सालों में शिक्षकों को लेकर राजस्थान, हरियाणा , झारखण्ड , रांची में जितनी भी हडतालें हुईं हैं उनकी मांग में शिक्षकों ने अपने भत्ते ही हैं | शिक्षकों का इस तरह के आन्दोलन खड़े करना सरकार की शिक्षा को लेकर हवाई जिम्मेदारी ही दिखाता है | वहीँ दूसरी ओर अध्यापक बनने के लिए बी एड जैसी योग्यता सिर्फ एक खानापूर्ति बन गई है | बी एड उन्हें एक अच्छा अध्यापक बनने को प्रेरित नही करता बल्कि उन्हें सिर्फ सरकारी नौकरी पाने का जरिया बन गया है | आज कल अध्यापकों की नौकरी को आरामदायक नौकरी कहा जाने लगा है | राज्य सरकारों ने शिक्षा में कई तरह के बदलाव किये हैं उसमे सुधार लाने के लिए लेकिन ये सुधार के नाम पर सिर्फ सरकारी प्रपंच ही मालूम पड़ते हैंसर्व शिक्षा अभियान राज्य स्तर पर सरकारी स्कूलों को संबल देती है भौतिक सुविधाओं में भी और अध्यापकों की ट्रेनिंग  भी कराती है | लेकिन एसएसए की इस ट्रेनिंग में केवल खानापूर्ति और सरकार का ढकोसला है |  इस तरह की कार्यशालाओं ने उन्हें ऊबने के लिए मजबूर कर दिया है
शिक्षकों के उत्साहवर्धन के लिए हर साल राज्य और केंद्र सरकारें शिक्षकों को उनके काम के लिए इनाम वितरण करती है | लेकिन यह इनामी प्रक्रिया में इतना घालमेल है कि ऐसे शिक्षकों को इनाम मिल रहे है जो अन्य शिक्षकों को हतौत्साहित ही करते हैं | प्रधानमंत्री मनमोहन  सिंह ने प्राथमिक शिक्षा के ऊपर अपने वक्तव्य में कहा था कि बच्चों के सीखने कि गति में लगातार  गिरावट आई है और अब हमें शिक्षा कि गुणवत्ता के लिए नामांकन और खर्च से निकल कर कक्षाकक्ष की तरफ ध्यान देना होगा | लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता के लिए जरूरी है अच्छे शिक्षकों का होना | जो सिर्फ बी एड कि डिग्री लेकर घूम रहे है

वर्ष २००४-०५ से शिक्षा पर होने वाले सरकारी खर्च में लगातार बढ़ोतरी हुई है | यह खर्च २००४-०५ में हमारी जीडीपी का . प्रतिशत था और २०११-१२ में यह बढ़कर प्रतिशत हो गयाहर साल शिक्षा को लेकर एक नई\ नीति और शिक्षा के ऊपर बढ़ रहा खर्च सिर्फ सरकार का कि मजबूरी दिखाता है | शिक्षा को लेकर किसी तरह कि कोई ठोस  नीति नही है | प्राथमिक स्तर  पर शिक्षा कि स्थिति यह बताती है कि शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह से काम करने पर कुछ नही होगा | शिक्षक को उचित ट्रेनिंग दी जाये और शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे भ्रष्ट्राचार को ख़त्म होना होगाऔर अगर ऐसे ही  स्थितियों के साथ समझौता कर लिया गया तो भारत के पास शिक्षा के नाम पर सिर्फ नीतियों का झुनझुना ही बचेगा




सोमवार, 27 अगस्त 2012

भगौड़ी सुनीता


वो बच्ची बार बार हाथ छुड़ाकर भाग जाती | पैरों में  बंधी पायल की आवाज़ सुनकर उसकी माँ उसे पकड़ लाती और फिर उसका हाथ पकड़ कर चलने लगती | सुनीता आज अपने पुराने स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र लेने जा रही है | गोद में नौ महीने की बच्ची और दूसरे से अपनी नटखट बालिका को लेकर वह स्कूल में प्रवेश करती है | सुनीता की शादी तो तभी हो गई थी जब वो छठी कक्षा में पढ़ रही थी, वो भी अपनी उम्र से दोगुने उम्र के लड़के के साथ | शादी के पहले दो साल वो बहुत खुश थी| और एक बच्ची की माँ भी बन गई| पर ना जाने क्यों उसके पति ने ड्रग्स और शराब का सेवन करना शुरू कर दिया |


सुनीता जब स्कूल में थी तो बहुत होशियार थी| सारा दिन खेलना कूदना और बातें करना| पढ़ाई करना उसे पसंद नही था क्योंकि उसे यह शब्दों का मायाजाल समझ ही नही आता था| उसे तो फूँक मार कर चूलेह पर रोटी पकाना, खेतों में घास की कटाई करना खूब भाता था| उसे तो खेतों में किस फसल को किस समय और कितना पानी जरुरत पड़ता है,सब पता था| बाबा के लाख मना करने पर भी वह जिद्द करके उनके साथ मंडी चली जाती और मोल भाव करती | सुनीता घर में सबसे बड़ी थी | जब अपनी शादी की बात उसने सुनी तो घबरा गई | लेकिन माँ ने उसे समझाया कि शादी के बाद उसे वही सब करना होगा जो उसे अच्छा लगता है|
सूखे होठों को पूंछते हुए सुनीता ने अपनी अध्यापिका को नमस्कार कहा | अपनी चाय का झूठा गिलास अध्यापिका ने चौथी में पढ़ रही जुग्गा को धोने के लिए देते हुए सुनीता से पूछा,”तू कैसे आज यहाँ आई ? तेरा मतदाता प्रमाण पत्र बना कि नही ” सुनीता ने सांस भरकर कहा ,“नही, उसी के वास्ते प्रमाण पत्र लेने आई हूँ |” अध्यापिका उसे छोड़कर कुछ कागज़ ढूँढने लगती है |


सुनीता की नज़रें उसी पेड़ पर पड़ती हैं जिसे उसने लगाया था और याद करती है कि कैसे वो तेज़ी से उस नीम के पेड़ पर चढ़ जाती थी और उसमे छुपती थी| आज वो नीम का पेड़ बहुत बड़ा और विशाल हो गया है | पेड़ की इस विशाल काया से उसे डर लगता है |जब सुनीता की शादी तय हुयी तो सुनीता को सभी उसके पति के हष्ट पुष्ट शरीर के लिए खूब चिढाते | लेकिन जब वही पति उसे शराब पी कर मारने लगा तो वह अपनी छह महीने की छोटी बच्ची लेकर भाग आई| सुनीता तो शुरू से ही ऎसी थी| मारना, लड़ना, झगड़ना उसे बिलकुल पसंद नही था |

स्कूल में जब भी उसे मार पड़ती थी तो भी स्कूल से भाग आती तब भी सारे बच्चे उसे “भगौड़ी सुनीता” के नाम से बुलाते थे | फर्क आज बस इतना है की आज पूरा गाँव बुलाता है|

दो पन्नो का फार्म लेकर जब अध्यापिका कार्यालय से बाहर निकली तो पूछा,”तू कहाँ है आजकल दिखती नही ?” गोद में ली बच्ची का नाक पोंछते हुए सुनीता ने कहा,”पास के गाँव में ही हूँ |” अध्यापिका ,”अरे वहां कैसे पड़ गई तू ?” चश्मा उठाकर फार्म का नंबर चेक करते हुए| “दो साल से वहां शादी कर रखी है |” अध्यापिका फार्म रखकर ,”तूने हमे नही बुलाया” अध्यापिका की यह बात सुनकर सुनीता की आंसू से भरी  आखें सूख गई और मुंह खुला रह गया | फिर पूछा ”अब किससे शादी हुयी तेरी?” यह बोल कर अध्यापिका सभी बच्चों को कक्षाकक्ष में बिठाने लगी | सुनीता वो दिन याद करने लगी जब वो अपने दूसरे पति के घर में घुसी | एक औरत खाट पर पड़ी कराह रही थी और उसकी दो बेटियाँ उसके पास पानी लिए खडी थी| सुनीता जानती थी कि वो उसके पति की पहली पत्नी थी| और जैसे ही उसके पास गई तो वह बोली ,”मेरी बेटियों का ध्यान रखना |” सुनीता की नज़रें अपनी बेटी की और दौड़ गई |



सुनीता जानती थी कि जब उसकी माँ से घर में तीसरी बेटी हुयी थी थी तो कितना हंगामा हुआ था| वह सोचने लगी कि लड़का लड़की के भेद ने तो दोनों का अस्तित्व ही मिटा दिया है| आघाती जीवंत भूत में सुप्त सुनीता के कान में जोरों से आवाज़ पड़ती है ,”यह छोरी तेरे दूसरे पति से है?” जवाब आया ,”हाँ मैडम” सुनीता सोच में है कि जो अपना जीवन नही बना पाई वह इन चारों  को कैसे संभालेगी | फार्म देते हुए अध्यापिका बोली,”ये फार्म भरकर परसों दे दियो तो मतदाता प्रमाण पत्र बन जाएगा तेरा ” और इस बार वोट जरूर दियो, मालूम है न कोंन खड़ा हुआ है इस बार सरपंच के चुनाव में? अरे ! अपने हेडमास्टर साहिब | याद है ना तुझे पढाया है उन्होंने | सुनीता अपनी खेल रही नटखट बेटी का हाथ पकड़ कर चली जाती है |