शिक्षा को आकड़ों में मापने की स्थिति न केवल उच्च शिक्षा में है बल्कि प्राथमिक शिक्षा में भी यही हाल है | राजस्थान सरकार हर सत्र के आरम्भ में "प्रवेश उत्सव" नाम से बच्चों का नामांकन सरकारी स्कूलों में बढ़ाने का प्रयास करती है | खास बात यह कि यहाँ भी सिर्फ नामांकन पर ही जोर दिया जाता है | सरकार के मानकों के अनुसार पहली कक्षा में पढने वाले बच्चे की उम्र 6 साल से कम नही होनी चाहिए लेकिन राजस्थान के ज्यादातर उच्च प्राथमिक स्कूलों में कक्षा एक तीन वर्ष के बच्चे भी आ रहे हैं | क्यूंकि इस तथाकथित "प्रवेश उत्सव" के नाम पर नामांकन बढ़ाने के लिए इन स्कूलों में इतने छोटे बच्चों को एडमिशन दे दिया जाता है |
शिक्षा का अधिकार यानी आरटीई का हवाला देकर उन्हें हर साल अगली कक्षा में उन्नत कर दिया जाता है | इसका परिणाम यह होता है कि उम्र के अनुपात में बच्चा बड़े स्तर की कक्षा में प्रवेश कर जाता है और शैक्षिक स्तर पर पिछड़ता चला जाता है | प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता इन सरकारी स्कूलों में भगवन भरोसे है या यूँ कहें कि नगण्य है जिससे शैक्षिक रूप से “कमज़ोर” वर्ग तैयार हो रहा है | ये वो हिस्सा है जो प्राथमिक शिक्षा पूरी कर सकता था सच कहा जाये तो हमारी शिक्षा व्यवस्था में बहुतायात में एक तरह का "अपशिष्ट" बन रहा है जिसमे देश भर से 40 प्रतिशत ड्रॉप आउट और राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में 75 प्रतिशत तक भी पहुँच गया है |
राजस्थान में वर्ष 2011 में “असर” की एक रिपोर्ट के अनुसार जो बच्चे अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर चुके हैं उनमे से 57.3% बच्चे ऐसे हैं जो दूसरी कक्षा की किताब भी नही पढ़ पाते और 75% गणित में सरल भाग भी नही कर पाते | वर्ष 2006 में पांचवी के 56% बच्चे पढ़ पाते थे लेकिन वर्ष 2011 में गिरकर यह आंकडा 42.7% तक आ पहुंचा | गणित में तो हालत और भी ख़राब है .इसमें वर्ष 2006 से अबतक 30 प्रतिशत तक की गिरावट आई है |
वहीँ आरटीई को आधार मानकर जो स्कूल तीन से चार साल के बच्चों को अगली कक्षा में उन्नत करते हैं पर सच तो यह है कि यह कानून तो 6 साल के बच्चे पर ही लागू होता है और दूसरी ओर सभी राज्यों में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा हमारे देश भर में लगभग साढ़े बारह लाख आँगनवाडियां खाली ही पड़ी रहती हैं | वो भी इन बच्चों को आँगनवाड़ियों में लाने का बीड़ा नही लेते | शिक्षा की गुणवत्ता आकड़ों के घालमेल में कहीं खो सी गई है | आकड़ों के पीछे की सच्चाई और उस सच्चाई को गुणवत्ता के ढांचे में देखने की जरुरत है | विद्यालयों में बच्चों की संख्या बढ़ने से खुश होना एक समय की संतुष्टि दे सकता है लेकिन लम्बे समय के लिए यह घातक है | आखिर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर ही आधारित है |











