सोमवार, 27 अगस्त 2012

आंकड़ों की शिक्षा

देश के मनाव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के बयान के अनुसार भारत की उच्च शिक्षा में पिछले चार साल से  नामांकन में 65% का बढ़ावा हुआ है | यह हमारे भारत देश के लिए एक अच्छी बात हो सकती है लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि "नामांकन" बढ़ा है | शिक्षा जैसी आधारभूत जरुरत को भी आंकड़ों और संख्याओं से तोला जाना कहाँ तक ठीक है ? क्या संख्या गुणवत्ता मापने का पैमाना बन सकती है?

शिक्षा को आकड़ों में मापने की स्थिति न केवल उच्च शिक्षा में है बल्कि प्राथमिक शिक्षा में भी यही हाल है | राजस्थान सरकार हर सत्र के आरम्भ में "प्रवेश उत्सव" नाम से बच्चों का नामांकन सरकारी स्कूलों में बढ़ाने का प्रयास करती है | खास बात यह कि यहाँ भी सिर्फ नामांकन पर ही जोर दिया जाता है | सरकार के मानकों  के अनुसार पहली कक्षा में पढने वाले बच्चे की उम्र 6 साल से कम नही होनी चाहिए लेकिन राजस्थान के ज्यादातर उच्च प्राथमिक स्कूलों में कक्षा एक तीन वर्ष के बच्चे भी आ रहे हैं | क्यूंकि इस तथाकथित "प्रवेश उत्सव" के नाम पर नामांकन बढ़ाने के लिए इन स्कूलों में इतने छोटे बच्चों को एडमिशन दे दिया जाता है |

 शिक्षा का अधिकार यानी आरटीई का हवाला देकर उन्हें हर साल अगली कक्षा में उन्नत कर दिया जाता है | इसका परिणाम यह होता है कि उम्र के अनुपात में बच्चा बड़े स्तर की कक्षा में प्रवेश कर जाता है और शैक्षिक स्तर पर पिछड़ता चला जाता है | प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता इन सरकारी स्कूलों में भगवन भरोसे है या यूँ कहें कि नगण्य है जिससे शैक्षिक रूप से “कमज़ोर” वर्ग तैयार हो रहा है | ये वो हिस्सा है जो प्राथमिक शिक्षा पूरी कर सकता था सच कहा जाये तो हमारी शिक्षा व्यवस्था में बहुतायात में एक तरह का "अपशिष्ट" बन रहा है जिसमे देश भर से 40 प्रतिशत ड्रॉप आउट और राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में 75 प्रतिशत तक भी पहुँच गया है |

 राजस्थान में वर्ष 2011 में “असर” की एक रिपोर्ट के अनुसार जो बच्चे अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर चुके हैं उनमे से 57.3% बच्चे ऐसे हैं जो दूसरी कक्षा की किताब भी नही पढ़ पाते और 75% गणित में सरल भाग भी नही कर पाते | वर्ष 2006 में पांचवी के 56% बच्चे पढ़ पाते थे लेकिन वर्ष 2011 में गिरकर यह आंकडा 42.7% तक आ पहुंचा | गणित में तो हालत और भी ख़राब है .इसमें वर्ष 2006 से अबतक 30 प्रतिशत तक की गिरावट आई है |

 वहीँ आरटीई को आधार मानकर जो स्कूल तीन से चार साल के बच्चों को अगली कक्षा में उन्नत करते हैं पर सच तो यह है कि यह कानून तो 6 साल के बच्चे पर ही लागू होता है और दूसरी ओर सभी राज्यों में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा हमारे देश भर में लगभग साढ़े बारह लाख आँगनवाडियां खाली ही पड़ी रहती हैं | वो भी इन बच्चों को आँगनवाड़ियों में लाने का बीड़ा नही लेते | शिक्षा की गुणवत्ता आकड़ों के घालमेल में कहीं खो सी गई है | आकड़ों के पीछे की सच्चाई और उस सच्चाई को गुणवत्ता के ढांचे में देखने की जरुरत है | विद्यालयों में बच्चों की संख्या बढ़ने से खुश होना एक समय की संतुष्टि दे सकता है लेकिन लम्बे समय के लिए यह घातक है | आखिर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर ही आधारित है |

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

"कोस कोस पर बदले पानी"....


पानी जीवन का एक अहम हिस्सा है | आदिकाल से ही पानी ने मानव जीवन को सरल बनाया है | एक समय ऐसा था जब नदियाँ , तालाब, सरोवर आदि जल के स्त्रोतों से ही इन्सान पानी पीता भी था और इस्तेमाल भी करता था | फिर धीरे धीरे तकनीक और विज्ञान के विकास ने भी पानी को इस्तेमाल किया और पानी से बिजली बनने लगी, भाप से इंजन चलाए जाने लगे | एक तरफ तो मानव जीवन को सरल बनाने के लिए पानी का इस्तेमाल तकनीक और विज्ञान में किया जाने लगा वहीँ दूसरी ओर पानी दूषित भी होने लगा |

समय बीतने के साथ पानी और भी गन्दा होता गया | अब पीने के लिया स्वच्छ पानी की जरुरत थी | स्वच्छ पानी की इस अवधारणा ने "मिनरल वाटर" जैसे पानी को जन्म दिया और "बिसलेरी" का आविष्कार हुआ | मनुष्य ने अपने स्वास्थ्य के लिए "मिनरल वाटर" पीना शुरू किया और साथ ही खाना बनाने के लिए अलग और कपडे धोने के लिए अलग यहान तक की हाथ धोने के लिए अलग तरह के पानी का इस्तेमाल किया जाने लगा | इस " मिनरल वाटर" की गाथा बड़ी ही रोचक निकली | आज कल तो बाज़ार में मिनरल वाटर के करीब पचास से अधिक ब्रांड्स उतर आयें हैं |
अब चिंता यह है कि पिया जाये तो कौन सा पानी पिया जाये? "बिसलेरी " या "एक्वाफीना" , "मैकडोवल्स" या "एक्वालाईफ" | "यानि जो पानी पहले सभी के लिए एक समान थे , उसके अब सौ से भी अधिक रूप देखने को मिलते हैं | लेकिन अच्छे स्वास्थ्य के लिए पानी के किस रूप पर विश्वास किया जाये ?

हमारे भारत के लिए अक्सर यह कहा जाता है कि "कोस कोस पर बदले पानी , कोस कोस पर बदले वाणी " अभी भी यही प्रथा चल रही है लेकिन पानी की जगह "मिनरल वाटर " ने ले ली है | स्वच्छ पानी के विभिन्न रूपों में बिकने वाले यह ब्रांड दिखाते हैं कि भारत को अपने स्वास्थ्य कि चिंता है लेकिन आश्चर्यजनक बात तो यह है कि गंदे पानी से पैदा होने वाली बीमारियाँ अब भी जड़ से ख़त्म नहीं हुईं हैं | भारत में हर साल एक लाख से भी अधिक लोग गंदे पानी की वजह से मौत के मुह में समा जाते हैं | भारत के ६०० जिलों में जमीनी पानी का एक तिहाई हिस्सा पीने के लिए सुरक्षित नहीं है | राजस्थान , गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों में हालत और भी ख़राब हैं | यहाँ कुल ६५ लाख लोग गंदे पानी से जनित बिमारियों के शिकार हैं | विश्व संसाधन रिपोर्ट के अनुसार भारत में सप्लाई का पानी सीवेज से निकलने वाले गंदे तत्वों से प्रदूषित है | भारत पानी की गुणवत्ता के आधार पर १२२ देशों की सूची में १२० स्थान पर है | विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली का पानी दुनिया के कई बड़े शहरों से भी गन्दा है | केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के अनुसार दिल्ली के नलों से आने वाले पानी में कार्सोजेनिक और कुछ जहरीले तत्व मौजूद हैं जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय किये गए मानक से भी ऊपर हैं | रिपोर्ट के अनुसार भारत के पौने दो लाख गावों में लगभग २ लाख लोग रसायनिक पानी पीते हैं |



ये आकड़ें बताते हैं कि पानी के चाहे कितने ही अलग अलग ब्रांड आ गए हों लेकिन समय के साथ साथ पानी के स्वच्छता में कमी ही आई है | पीने के इस दूषित पानी ने न जाने कितनी ही मौतें ले ली हैं | स्वच्छता के नाम पर सिर्फ पैसा कमाने की तकनीक ने ही जन्म लिया है | सभी लोगों में एक समान रूप से प्रयोग आने वाले पानी को भी बाँट दिया गया है |
गाँधी ने कहा था कि नमक सभी के जरुरत की वस्तु है और इस पर सभी का समान रूप से अधिकार होना चाहिए | इसलिए गाँधी जी ने नमक आन्दोलन चलाया गया | लेकिन पानी तो न केवल मनुष्य बल्कि सभी पशुओं और पेड़ पौधों के लिए भी जरूरी है| लेकिन पानी के ये मानव द्वारा बदले हुए रूप इन्सान कि प्रवृति को ही दिखाते हैं | ब्रांडेड लोगों के लिए "ब्रांडेड" पानी और लोकल के लिए "लोकल" पानी|

मंगलवार, 31 मई 2011

ईश्वर की दी इस प्रकृति को नमन

ईश्वर की दी इस प्रकृति को
हम करें मिलकर नमन
जिसने व्यथित जीवन को
प्रदान किया चैन अमन                                 

कल -कल करती बहती नदी
सरसराता वायु प्रवाह 
हरे-भरे पौधों और पर्वतों से
सुसज्जित है हमारी धरा


कहीं समुद्र की विशाल धरा
कहीं पगडण्डी का छोटा किनारा
हर जगह हैं रंग बिखरे हुए
उजले हुए , निखरे हुए 
नमन है उसे मिलकर हमारा
जिसने इस धरती को संवारा 


इस सुन्दर प्रकृति को
न लगे किसी की नज़र
बचा लो इसे, संभालो इसे 
यदि करना है जीवन बसर
आओ मिल कर हम 
यही प्रण लें आज
रखेंगे अपनी धरा को संभाल
और बचाएंगे इसकी  लाज         



कौन है ज़िम्मेदार

 कौन है ज़िम्मेदार
भारत की इस दशा का
कही कौन है ज़िम्मेदार 
लोकतंत्र का ढांचा हिलाकर
खोखला किया किसने इसे बार-बार                                                                

 












गरीबी, भूख, अशिक्षा का
श्राप कब मिटेगा 
और कब तक इसकी हालत पर
यह  इन्सान  बद्सलूक हंसेगा
कहाँ गए विकास करने वाले इसके कर्णधार 
लोकतंत्र का ढांचा हिलाकर
खोखला किया किसने इसे बार- बार








कालविजयी हमारा भारत
एक महान शक्ति है
 फिर क्यों घूसखोरी, कालाबाजारी में सबकी भक्ति है?
हर दिन है मचता उत्पात 
हर समय है हाहाकार
 



लोकतंत्र का ढांचा हिलाकर 
खोखला किया किसने इसे बार- बार